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Sanskrit Class 10 – Chapter 4- जननी तुल्यवत्सला- NCERT- Hindi & English Translation

Last Updated on 20/08/2026 by MakeToss

CBSE शेमुषी भाग-2 Sanskrit Class 10 Chapter 4 -जननी तुल्यवत्सला – Hindi & English Translation given below. Also, word meanings (शब्दार्थ:), अन्वयः, सरलार्थ are given for the perfect explanation.

प्रस्तुतोऽयं पाठ: महर्षिवेदव्यासविरचितस्य ऐतिहासिकग्रन्थस्य महाभारतान्तर्गतस्य “वनपर्व” इत्यत: गृहीत:। इयं कथा सर्वेषु प्राणिषु समदृष्टिभावनां प्रबोधयति। अस्याः अभीप्सितः अर्थोऽस्ति यद् समाजे विद्यमानान् दुर्बलान् प्राणिन: प्रत्यपि मातुः वात्सल्यं प्रकर्षेणैव भवति।

  • प्रस्तुतोऽयम् (प्रस्तुतः + अयम्) = यह प्रस्तुत (दिया गया)
  • पाठः = पाठ
  • महर्षिवेदव्यासविरचितस्य (महर्षि-वेदव्यास-विरचितस्य) = महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित (लिखे गए)
  • ऐतिहासिकग्रन्थस्य = ऐतिहासिक ग्रन्थ
  • महाभारतान्तर्गतस्य (महाभारत + अन्तर्गतस्य) = महाभारत के अंतर्गत आने वाले (महाभारत के भीतर के)
  • “वनपर्व” = “वनपर्व” (महाभारत के अध्यायों/भागों को ‘पर्व’ कहा जाता है)
  • इत्यतः (इति + अतः) = यहाँ से / इससे
  • गृहीततः (गृहीतः) = लिया गया है (स्वीकार किया गया है)
  • इयम् = यह
  • कथा = कहानी
  • सर्वेषु = सभी
  • प्राणिषु = प्राणियों में (जीवों में)
  • समदृष्टिभावनाम् (सम-दृष्टि-भावनाम्) = समान दृष्टि (एक जैसी नजर) की भावना को
  • प्रबोधयति = जगाती है / ज्ञान कराती है (प्रेरणा देती है)
  • अस्याः = इस (कहानी) का
  • अभीप्सितः = इच्छित / मुख्य (चाहा गया)
  • अर्थोऽस्ति (अर्थः + अस्ति) = अर्थ है (संदेश है)
  • यद् (यत्) = कि
  • समाजे = समाज में
  • विद्यमानान् = मौजूद / रहने वाले
  • दुर्बलान् = कमजोर
  • प्राणिनः (प्राणिनः प्रति) = प्राणियों के
  • प्रत्यपि (प्रति + अपि) = प्रति भी (के प्रति भी)
  • मातुः = माता का (माँ का)
  • वात्सल्यम् = ममता / स्नेह (लाड-प्यार)
  • प्रकर्षेणैव (प्रकर्षेण + एव) = अत्यधिक ही (बहुत अधिक रूप से ही)
  • भवति = होता है।

महत्वपूर्ण संधि-विच्छेद

  • प्रस्तुतोऽयम् = प्रस्तुतः + अयम् (विसर्ग उत्व संधि – अवग्रह रूप)
  • महाभारतान्तर्गतस्य = महाभारत + अन्तर्गतस्य (दीर्घ स्वर संधि)
  • इत्यतः = इति + अतः (यण् स्वर संधि)
  • अर्थोऽस्ति = अर्थः + अस्ति (विसर्ग उत्व संधि – अवग्रह रूप)
  • प्रत्यपि = प्रति + अपि (यण् स्वर संधि)
  • प्रकर्षेणैव = प्रकर्षेण + एव (वृद्धि स्वर संधि)

कश्चित् कृषक: बलीवर्दाभ्यां क्षेत्रकर्षणं कुर्वन्नासीत्। तयोः बलीवर्दयो: एक: शरीरेण दुर्बलः जवेन गन्तुमशक्तश्चासीत् । अतः कृषक: तं दुर्बलं वृषभं तोदनेन नुद्यमानः अवर्तत। सः ऋषभ : हलमूढ्वा गन्तुमशक्त: क्षेत्रे पपात। क्रुद्धः कृषीवलः तमुत्थापयितुं बहुवारम् यत्नमकरोत्। तथापि वृषः नोत्थित:।

सरलार्थ: कोई किसान दो बैलों के द्वारा खेत की जुताई कर रहा था। उन दो बैलों में से एक शरीर से कमजोर और तीव्र गति से चलने में असमर्थ था। इसलिए किसान उस कमजोर बैल को तकलीफ से हाकता था। वह बैल हल ढोकर चलने में असमर्थ होकर खेत में गिर गया। क्रोधित किसान उसको उठाने के लिए बहुत बार प्रयास किया। फ़िर भी बैल नहीं उठा।

  • कश्चित् = कोई।
  • कृषकः = किसान।
  • बलीवर्दाभ्याम् = दो बैलों से (दो बैलों के द्वारा)।
  • क्षेत्रकर्षणम् = खेत की जुताई (खेत जोतना)।
  • कुर्वन्नासीत् (कुर्वन् + आसीत्) = कर रहा था।
  • तयोः = उन दोनों।
  • बलीवर्दयोः = बैलों में से।
  • एकः = एक (बैल)।
  • शरीरेण = शरीर से।
  • दुर्बलः = कमजोर।
  • जवेन = तेज गति से (तेजी से)।
  • गन्तुमशक्तश्चासीत् (गन्तुम् + अशक्तः + च + आसीत्) = और जाने (चलने) में असमर्थ था।
    • गन्तुम् = जाने/चलने में
    • अशक्तः = असमर्थ
    • = और
    • आसीत् = था
  • अतः = इसलिए।
  • कृषकः = किसान।
  • तम् = उस।
  • दुर्बलम् = कमजोर।
  • वृषभम् = बैल को।
  • तोदनेन = कष्ट देकर (कष्टदायक प्रहारों से या लाठी से मारकर)।
  • नुद्यमानः अवर्तत (नुद्यमानः + अवर्तत) = हाँकता रहा (जबरदस्ती आगे ढकेलता रहा)।
  • सः = वह।
  • ऋषभः = बैल।
  • हलमुढ्वा (हलम् + ऊढ्वा) = हल उठाकर (हल ढोकर)।
  • गन्तुमशक्तः (गन्तुम् + अशक्तः) = चलने में असमर्थ (होकर)।
  • क्षेत्रे = खेत में।
  • पपात = गिर गया।
  • क्रुद्धः = क्रोधित (गुस्साए हुए)।
  • कृषीवलः = किसान ने।
  • तमुत्थापयितुम् (तम् + उत्थापयितुम्) = उसे उठाने के लिए।
  • बहुवारम् = बहुत बार (अनेक बार)।
  • यत्नमकरोत् (यत्नम् + अकरोत्) = प्रयत्न किया (कोशिश की)।
  • तथापि = फिर भी / तो भी।
  • वृषः = बैल।
  • नोत्थितः (न + उत्थितः) = नहीं उठा।

महत्वपूर्ण संधि-विच्छेद और व्याकरण

  • कुर्वन्नासीत् = कुर्वन् + आसीत् (व्यंजन संधि)
  • गन्तुमशक्तश्चासीत् = गन्तुम् + अशक्तः + च + आसीत् (व्यंजन, विसर्ग और दीर्घ संधि का मिला-जुला रूप)
  • हलमुढ्वा = हलम् + ऊढ्वा (ऊढ्वा में ‘वह्’ धातु और ‘क्त्वा’ प्रत्यय है, जिसका अर्थ है ‘उठाकर’)
  • तमुत्थापयितुम् = तम् + उत्थापयितुम् (उत्थापयितुम् में ‘तुमुन्’ प्रत्यय है – उठाने के लिए)
  • नोत्थितः = न + उत्थितः (गुण स्वर संधि)

भूमौ पतिते स्वपुत्रं दृष्ट्वा सर्वधेनूनां मातुः सुरभेः नेत्राभ्यामश्रूणि आविरासन्। सुरभेरिमामवस्थां दृष्ट्वा सुराधिप: तामपृच्छत्-” अयि शुभे! किमेवं रोदिषि? उच्यताम्” इति। सा च

सरलार्थ: जमीन पर गिरे हुए अपने पुत्र को देखकर सब गायों की माँ सुरभि की आँखों में आंसू आने लगे । सुरभि की इस अवस्था को देखकर देवताओं के राजा (इन्द्र) ने उससे (सुरभि से ) पूछा – अरे शुभा ! इस तरह क्यों रोती हो ? बोलो ? और वह

  • भूमौ = भूमि पर (जमीन पर)।
  • पतिते = गिरे हुए।
  • स्वपुत्रम् = अपने पुत्र (बेटे/बैल) को।
  • दृष्ट्वा = देखकर।
  • सर्वधेनूनाम् (सर्व + धेनूनाम्) = सभी गायों की।
  • मातुः = माता।
  • सुरभेः = सुरभि के (कामधेनु के)।
  • नेत्राभ्याम् = दोनों आँखों से।
  • अश्रूणि = आँसू।
  • आविरासन् (आविः + आसन्) = निकल आए (बहने लगे)।
  • सुरभेरिमामवस्थाम् (सुरभेः + इमाम् + अवस्थाम्) = सुरभि की इस दशा को।
    • सुरभेः = सुरभि की
    • इमाम् = इस
    • अवस्थाम् = स्थिति/दशा को
  • दृष्ट्वा = देखकर।
  • सुराधिपः (सुर + अधिपः) = देवताओं के राजा (इंद्र) ने।
  • तामपृच्छत् (ताम् + अपृच्छत्) = उससे पूछा।
  • अयि = हे! (संबोधन)।
  • शुभे! = कल्याणी! / भाग्यशाली!
  • किमेवम् (किम् + एवम्) = किसलिए इस प्रकार (क्यों इस तरह)।
  • रोदिषि? = रो रही हो?
  • उच्यताम् = कहो / बताओ।
  • इति = ऐसा (वाक्य की समाप्ति पर)।
  • सा = वह (सुरभि)।
  • = और।

महत्वपूर्ण संधि-विच्छेद और व्याकरण

  • दृष्ट्वा = दृश् + क्त्वा प्रत्यय (देखकर के अर्थ में)।
  • आविरासन् = आविः + आसन् (विसर्ग ऋत्व संधि)।
  • सुरभेरिमामवस्थाम् = सुरभेः + इमाम् + अवस्थाम् (विसर्ग संधि और व्यंजन संयोग)।
  • सुраधिपः = सुर + अधिपः (दीर्घ स्वर संधि)।
  • तामपृच्छत् = ताम् + अपृच्छत् (व्यंजन संयोग)।
  • किमेवं = किम् + एवम् (व्यंजन संयोग)।

विनिपातो न वः कश्चिद् दृश्यते त्रिदशाधिप!।
अहं तु पुत्रं शोचामि तेन रोदिमि कौशिक!।।

शब्दार्थ: विनिपातो – विनाश /नाश / टूटा-फूटा भाग /पतन (ruin) – नहीं (no) वः – हमारा (our)कश्चिद् -कोई (someone) दृश्यते– दिखाई देता है (visible) त्रिदशाधिप – देवताओं के राजा (इन्द्र) (Kings of God)अहं – मैं (I) तु – तो पुत्रंपुत्र को शोचामि – दुःख करता हूँ /करती हूँ (sorrow) तेन – उससे रोदिमि – रोती हूँ (crying ) कौशिकदेवताओं के राजा (इन्द्र) (Kings of God)

अन्वय: वः विनिपातो कश्चिद् न दृश्यते त्रिदशाधिप!।
अहं तु पुत्रं शोचामि कौशिक:! तेन रोदिमि ।

सरलार्थ: हमारा विनाश कोई नहीं देखता (महाराज) इंद्र! मैं तो पुत्र को दुःख करती हूँ। उससे (दुःख से ) रोती हूँ, कौशिक ( देवताओं के राजा (इन्द्र)।

  • विनिपातः (विनिपातो) = कष्ट / दुःख / पतन / कोई भारी विपत्ति.
  • = नहीं.
  • वः = हमारा (यहाँ यह ‘न च’ या ‘न वः’ रूप में आता है – जिसका भाव ‘कोई भी’ या ‘हमारा’ होता है).
  • कश्चित् (कश्चिद्) = कोई भी.
  • दृश्यते = दिखाई दे रहा है.
  • त्रिदशाधिप! = हे देवताओं के राजा! (इंद्र).
  • अहम् = मैं.
  • तु = तो / लेकिन.
  • पुत्रम् = (अपने) पुत्र (कमजोर बैल) के लिए.
  • शोचामि = शोक कर रही हूँ / दुःखी हूँ.
  • तेन = इसलिए (उसी कारण से).
  • रोदिमि = रो रही हूँ.
  • कौशिक! = हे इंद्र! (कौशिक इंद्र का ही एक नाम है).

संधि विच्छेद

  • विनिपातो = विनिपातः (विसर्ग उत्व संधि).
  • कश्चिद् = कश्चित् (व्यंजन जश्त्व संधि – ‘त्’ का ‘द्’ होना).

“भो वासव! पुत्रस्य दैन्यं दृष्ट्वा अहं रोदिमि। सः दीन इति जानन्नपि कृषकः तं बहुधा पीडयति। स: कृच्छ्रेण भारमुद्वहति । इतरमिव धुरं वोढुं स: न शक्नोति। एतत् भवान् पश्यति न?” इति प्रत्यवोचत्।

सरलार्थ: हे इन्द्र! पुत्र का दुःख देखकर मैं रोती हूँ । वह दुर्बल/लाचार है: जानते हुए भी (वह) किसान, उसको (कमजोर बैल को) बहुत बार पीड़ित करता है । वह कठिनाई/तंगी से भार उठाता है । दूसरों के समान धुरी (जुए को – गाड़ी के जुए का वह भाग जो बैलों के कंधों पर रखा रहता है ) को ढोने में वह असमर्थ था । यह आप नहीं देखते ? इस तरह उत्तर दिया।

  • भो = हे! / अरे!
  • वासव! = हे इंद्र! (वासव इंद्र का एक नाम है)।
  • पुत्रस्य = पुत्र की (बेटे की)।
  • दैन्यम् = दीनता को / लाचारी को (कमजोरी को)।
  • दृष्ट्वा = देखकर।
  • अहम् = मैं।
  • रोदिमि = रो रही हूँ।
  • सः = वह।
  • दीनः = कमजोर है / लाचार है।
  • इति = ऐसा।
  • जानन्नपि (जानन् + अपि) = जानते हुए भी।
  • कृषकः = किसान।
  • तम् = उसको।
  • बहुधा = अनेक बार / बहुत तरह से।
  • पीडयति = पीड़ित कर रहा है (कष्ट दे रहा है/सता रहा है)।
  • सः = वह।
  • कृच्छ्रेण = कठिनाई से (बहुत मुश्किल से)।
  • भारमुद्वहति (भारम् + उद्वहति) = बोझ उठा रहा है (भार ढो रहा है)।
  • इतरमिव (इतरम् + इव) = दूसरों की तरह (दूसरे मजबूत बैल के समान)।
  • धुरम् = जुए को (गाड़ी या हल का वह भाग जो बैल के कंधे पर रखा जाता है)।
  • वोढुम् = खींचने में (ढोने के लिए)।
  • सः = वह।
  • = नहीं।
  • शक्नोति = सकता है (सामर्थ्यवान नहीं है)।
  • एतत् = यह।
  • भवान् = आप।
  • पश्यति = देख रहे हैं।
  • न? = न? (क्या आप यह नहीं देख रहे हैं?)।
  • इति = ऐसा (उसने कहा)।
  • प्रत्यवोचत् (प्रति + अवोचत्) = उत्तर दिया / पलटकर बोलीं।

महत्वपूर्ण संधि-विच्छेद और व्याकरण

  • जानन्नपि = जानन् + अपि (व्यंजन संधि – ‘न्’ का द्वित्व होना)।
  • भारमुद्वहति = भारम् + उद्वहति (व्यंजन संयोग)।
  • इतरमिव = इतरम् + इव (व्यंजन संयोग)।
  • वोढुम् = वह् (ढोना) + तुमुन् प्रत्यय (खींचने या ढोने के लिए)।
  • प्रत्यवोचत् = प्रति + अवोचत् (यण् स्वर संधि)।

“भद्रे! नूनम्। सहस्राधिकेषु पुत्रेषु सत्स्वपि तव अस्मिन्नेव एतादृशं वात्सल्यं कथम्?” इति इन्द्रेण पृष्टा सुरभिः प्रत्यवोचत् –

  • भद्रे! = हे कल्याणी! / हे भद्र महिला! (सुरभि के लिए आदरसूचक संबोधन)
  • नूनम् = निश्चित ही / सचमुच।
  • सहस्राधिकेषु (सहस्र + अधिकेषु) = हज़ारों से अधिक।
  • पुत्रेषु = पुत्रों (संतानों) के।
  • सत्स्वपि (सत्सु + अपि) = होने पर भी।
  • तव = तुम्हारा / आपकी।
  • अस्मिन्नेव (अस्मीन + एव) = इसी पर ही (इसी पुत्र पर ही)।
  • एतादृशम् = ऐसा / इस प्रकार का।
  • वात्सल्यम् = ममता / विशेष स्नेह।
  • कथम्? = क्यों? / कैसे?
  • इति = ऐसा।
  • इन्द्रेण = इंद्र के द्वारा (इंद्र ने)।
  • पृष्टा = पूछी गई (सवाल किए जाने पर)।
  • सुरभिः = सुरभि।
  • प्रत्यवोचत् (प्रति + अवोचत्) = उत्तर दिया / बोलीं।

महत्वपूर्ण संधि-विच्छेद और व्याकरण

  • सहस्राधिकेषु = सहस्र + अधिकेषु (दीर्घ स्वर संधि)
  • सत्स्वपि = सत्सु + अपि (यण् स्वर संधि)
  • अस्मिन्नेव = अस्मिन् + एव (व्यंजन संधि – ‘न्’ का द्वित्व होना)
  • प्रत्यवोचत् = प्रति + अवोचत् (यण् स्वर संधि)
  • पृष्टा = प्रच्छ् (पूछना) + क्त प्रत्यय (स्त्रीलिंग रूप)

यदि पुत्रसहस्रं मे, सर्वत्र सममेव मे ।
दीनस्य तु सतः शक्र! पुत्रस्याभ्यधिका कृपा॥

शब्दार्थ: यदि यदि (if) पुत्रसहस्रं (सहस्रं +पुत्र) = सहस्रं– हज़ार (thousand) मे– मेरी सर्वत्र – सभी (every) सममेव – समान ही है (is the same) । मेमेरी दीनस्य – दुर्बल / पीड़ित (debilitated) तु – तो (so) सतः – अनन्त (eternal/infinite) शक्रदेवताओं के राजा (इन्द्र) (Kings of God) पुत्रस्याभ्यधिका (पुत्रस्य+अभ्यधिका ) = पुत्रस्य– पुत्र के अभ्यधिकासामान्य से अधिक (more than/ exceeding the common measure) कृपा कृपा (mercy)

अन्वय: यदि मे सहस्रं पुत्रं , सर्वत्र मे सममेव । पुत्रस्य दीनस्य तु अभ्यधिका सतः कृपा (भवति); शक्र:

सरलार्थ: यदि मेरे हज़ार पुत्र है (फ़िर भी) सभी मुझे समान ही हैं । पुत्र के दुर्बल/कमजोर होने पर तो सामान्य से अधिक अनन्त कृपा होती है (इन्द्र)।

  • यदि = भले ही / यदि।
  • पुत्रसहस्रम् (पुत्र + सहस्रम्) = हज़ारों पुत्र (संतानें)।
  • मे = मेरे (पास हैं)।
  • सर्वत्र = सब जगह / सभी पर।
  • सममेव (समम् + एव) = एक समान ही (बराबर ही)।
  • मे = मेरा (प्रेम/भाव है)।
  • दीनस्य = कमजोर / लाचार (पुत्र) के।
  • तु = तो / लेकिन।
  • सतः = होने पर (कमजोर होने की दशा में)।
  • शक्र! = हे इंद्र! (शक्र इंद्र का ही एक प्रसिद्ध नाम है)।
  • पुत्रस्य (पुत्रस्याभ्यधिका = पुत्रस्य + अभ्यधिका) = पुत्र पर।
  • अभ्यधिका = बहुत अधिक / अत्यधिक।
  • कृपा = दया / ममता / विशेष स्नेह।

संधि विच्छेद

  • सममेव = समम् + एव (व्यंजन संयोग)
  • पुत्रस्याभ्यधिका = पुत्रस्य + अभ्यधिका (दीर्घ स्वर संधि)

“बहून्यपत्यानि मे सन्तीति सत्यम्। तथाप्यहमेतस्मिन् पुत्रे विशिष्य आत्मवेदनामनुभवामि । यतो हि अयमन्येभ्यो दुर्बल:। सर्वेष्वपत्येषु जननी तुल्यवत्सला एव। तथापि दुर्बले सुते मातुः अभ्यधिका कृपा सहजैव ” इति। सुरभिवचनं श्रुत्वा भृशं विस्मितस्याखण्डलस्यापि हृदयमद्रवत्। स च तामेवमसान्त्वयत्- ” गच्छ वत्से! सर्व भद्रं जायेत।”

शब्दार्थ: बहून्यपत्यानि (बहूनि+अपत्यानि) = बहूनि – अनेक (many) अपत्यानि -बच्चे (children) मे – मेरे (my) सन्तीति (सन्ति + इति) = सन्ति – हैं (are) इति[अव्यय] समाप्ति सूचक शब्द (Termination code/word) तथाप्यहमेतस्मिन् (तथा+अपि+अहं+एतस्मिन्) आत्मवेदनामनुभवामि (आत्मवेदना+अनुभवामि) यतः – (because/since/therefore) अयमन्येभ्यो (अयं+अन्येभ्यो)। सर्वेष्वपत्येषु (सर्वे: + अपत्येषु) = सर्वे: सभी अपत्येषुसंतानों में भृशं– (greatly/ very much) विस्मितस्याखण्डलस्यापि (विस्मित +आखण्डलस्य+ अपि) =विस्मितआश्चर्यचकित (surprised) आखण्डलस्य – इन्द्र का अपिभी हृदयमद्रवत् (हृदयम् +अद्रवत् )= हृदयम्– हृदय /दिल अद्रवत्द्रवित हो गया/ भीग जाना तामेवमसान्त्वयत्

सरलार्थ: मेरे अनेक बच्चे हैं -सत्य है । तो भी मैं इस पुत्र में विशेषकर आत्मवेदना/अंतर्दर्शनात्‍मक महसूस करती हूँ । क्योंकि यह दूसरों से दुर्बल है । सभी संतानों में माता सामान रूप से ही प्यार करने वाली होती है । फिर भी दुर्बल पुत्र पर माँ का अधिक प्यार/कृपा स्वाभाविक ही है । सुरभि की बातों को सुनकर बहुत आश्चर्यचकित इन्द्र का भी हृदय द्रवित हो गया । और वह (इन्द्र) उसको दिलासा दिए – जाओ पुत्री, सब कल्याण हो।

  • बहूनि (बहून्यपत्यानि = बहूनि + अपत्यानि) = बहुत सी
  • अपत्यानि = सन्तानें
  • मे = मेरी
  • सन्ति (सन्तीति = सन्ति + इति) = हैं
  • इति = ऐसा
  • सत्यम् = सच है
  • तथापि (तथाप्यहमेतस्मिन् = तथापि + अहम + एतस्मिन्) = फिर भी
  • अहम् = मैं
  • एतस्मिन् = इस
  • पुत्रे = पुत्र पर
  • विशिष्य = विशेष रूप से (खास तौर पर)
  • आत्मवेदनाम् = अपनी निजी पीड़ा (दुःख) को
  • अनुभवामि = महसूस कर रही हूँ
  • यतो हि = क्योंकि
  • अयम् = यह
  • अन्येभ्यः = दूसरों से
  • दुर्बलः = कमजोर है
  • सर्वेषु (सर्वेष्वपत्येषु = सर्वेषु + अपत्येषु) = सभी
  • अपत्येषु = सन्तानों में
  • जननी = माता (माँ)
  • तुल्यवत्सला = एक समान प्रेम करने वाली (बराबर स्नेह रखने वाली)
  • एव = ही (होती है)
  • तथापि = फिर भी
  • दुर्बले = कमजोर
  • सुते = पुत्र पर
  • मातुः = माता की
  • अभ्यधिका = अत्यधिक (बहुत अधिक)
  • कृपा = दया / ममता
  • सहजैव (सहजा + एव) = स्वाभाविक ही है (प्राकृतिक ही है)
  • इति = ऐसा (सुरभि ने कहा)
  • सुरभिवचनम् = सुरभि के वचनों को (बातों को)
  • श्रुत्वा = सुनकर
  • भृशम् = अत्यधिक (बहुत ज़्यादा)
  • विस्मितस्य (विस्मितस्याखण्डलस्यापि = विस्मितस्य + आखण्डलस्य + अपि) = हैरान / चकित हुए
  • आखण्डलस्य = इन्द्र का (आखण्डल इन्द्र का एक नाम है)
  • अपि = भी
  • हृदयम् = हृदय (दिल)
  • अद्रवत् = पिघल गया (द्रवित हो गया)
  • सः = उन्होंने (इन्द्र ने)
  • = और
  • ताम् = उनको (सुरभि को)
  • एवम् = इस प्रकार
  • असान्त्वयत् = सान्त्वना दी (धीरज बँधाया)
  • गच्छ = जाओ
  • वत्से! = हे पुत्री! / हे बच्ची!
  • सर्वम् = सब कुछ
  • भद्रम् = कल्याण / अच्छा
  • जायेत = हो जाएगा।

महत्वपूर्ण संधि-विच्छेद और व्याकरण

  • बहून्यपत्यानि = बहूनि + अपत्यानि (यण् स्वर संधि)
  • सन्तीति = सन्ति + इति (दीर्घ स्वर संधि)
  • तथाप्यहमेतस्मिन् = तथापि + अहम् + एतस्मिन् (तथापि + अहम् में यण् संधि है)
  • सहजैव = सहजा + एव (वृद्धि स्वर संधि)
  • विस्मितस्याखण्डलस्यापि = विस्मितस्य + आखण्डलस्य + अपि (दीर्घ स्वर संधि और व्यंजन संयोग)
  • विशिष्य = वि + शिष् + ल्यप् प्रत्यय (विशेष रूप से)
  • श्रुत्वा = श्रु + क्त्वा प्रत्यय (सुनकर)

अचिरादेव चण्डवातेन मेघरवैश्च सह प्रवर्षः समजायत। लोकानां पश्यताम् एव सर्वत्र जलोपप्लवः सञ्जात:। कृषक: हर्षातिरेकेण कर्षणविमुख: सन् वृषभौ नीत्वा गृहमगात्।

सरलार्थ: जल्द ही प्रचण्ड हवा से और बादलों के गर्जना के साथ वर्षा हुई। लोगों के देखते ही देखते सभी जगह जलसंकट हो गया । किसान अधिक ख़ुशी से (खेत) जोतने से विमुख होकर दोनों बैलों को लेकर घर आ गया।

  • अचिरादेव (अचिरात् + एव) = शीघ्र ही / तुरंत ही (बिना किसी देरी के)
  • चण्डवातेन = भयंकर आँधी से / तेज हवा के थपेड़ों के साथ
  • मेघरवैश्च (मेघरवैः + च) = और बादलों के गर्जन के (मेघरवैः = बादलों की गड़गड़ाहट, च = और)
  • सह = साथ
  • प्रवर्षः = भारी वर्षा / मूसलाधार बारिश
  • समजायत = शुरू हो गई (हो गई)
  • लोकानाम् = लोगों के
  • पश्यताम् = देखते-देखते
  • एव = ही
  • सर्वत्र = सब जगह / चारों ओर
  • जलोपप्लवः (जल + उपप्लवः) = जलभराव / बाढ़ जैसी स्थिति (पानी ही पानी)
  • सञ्जाततः (सञ्जात: ) = हो गया
  • कृषकः = किसान
  • हर्षातिरेकेण (हर्ष + अतिरेकेण) = अत्यधिक खुशी के कारण (अत्यंत प्रसन्न होकर)
  • कर्षणविमुखः (कर्षण + विमुखः) = जुताई का काम छोड़कर (खेती से विमुख होकर)
  • सन् = होते हुए / होकर
  • वृषभौ = दोनों बैलों को
  • नीत्वा = लेकर
  • गृहमगात् (गृहम् + अगात्) = घर चला गया (गृहम् = घर, अगात् = गया)

महत्वपूर्ण संधि-विच्छेद और व्याकरण

  • अचिरादेव = अचिरात् + एव (व्यंजन जश्त्व संधि – ‘त्’ का ‘द्’ होना)
  • मेघरवैश्च = मेघरवैः + च (विसर्ग सत्व संधि)
  • जलोपप्लवः = जल + उपप्लवः (गुण स्वर संधि)
  • हर्षातिरेकेण = हर्ष + अतिरेकेण (दीर्घ स्वर संधि)
  • गृहमगात् = गृहम् + अगात् (व्यंजन संयोग)
  • नीत्वा = नी + क्त्वा प्रत्यय (लेकर के अर्थ में)

अपत्येषु च सर्वेषु जननी तुल्यवत्सला।
पुत्रे दीने तु सा माता कृपार्द्रहृदया भवेत्॥

शब्दार्थ: अपत्येषु -बच्चों में – और सर्वेषु– सभी जननी – माता तुल्यवत्सला– समान स्नेह देने वाली
पुत्रे -पुत्र पर/में दीने -दुर्बल तु -तो
सा -वह मातामाता कृपार्द्रहृदया (कृपा+आर्द्रहृदया)= कृपाकृपा आर्द्रहृदया – भीगे/सम्पूर्ण ह्रदय वाली भवेत्होता है/होती है ।

अन्वय: सर्वेषु अपत्येषु जननी तुल्यवत्सला। दीने
पुत्रे तु सा माता कृपार्द्रहृदया भवेत्॥

सरलार्थ: सभी बच्चों में माता समान स्नेह देने वाली (होती है) । और दुर्बल पुत्र पर तो माता की कृपा सम्पूर्ण ह्रदय वाली होती है।

  • अपत्येषु = संतानों में (बच्चों में)।
  • = और।
  • सर्वेषु = सभी।
  • जननी = माता (माँ)।
  • तुल्यवत्सला = एक समान प्रेम करने वाली (बराबर स्नेह रखने वाली) होती है।
  • पुत्रे = पुत्र (बच्चे) के।
  • दीने = कमजोर / लाचार / दुःखी होने पर।
  • तु = तो / लेकिन।
  • सा = वह।
  • माता = माता।
  • कृपार्द्रहृदया (कृपा + आर्द्र + हृदया) = दया से पिघले हुए हृदय वाली (ममता से भरे दिल वाली)।
  • भवेत् = हो जाती है।

संधि विच्छेद

  • कृपार्द्रहृदया = कृपा + आर्द्र + हृदया (कृपा + आर्द्र = कृपार्द्र [दीर्घ स्वर संधि])

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19 thoughts on “Sanskrit Class 10 – Chapter 4- जननी तुल्यवत्सला- NCERT- Hindi & English Translation”

  1. Truly very helpful. The other sites give only hindi translations, and its difficult for the students who do not regularly speak hindi to understand the more complicated words.

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